ग़ज़ल: किस की पुर कैफ़ सी याद आती रही

ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज, बाराबंकी यारो क्यूँ बेख़ुदी मुझ पे छाती रहीकिस की पुर कैफ़ सी याद आती रही पास आई तो थी ज़िन्दगी सिर्फ़ अश्कदूर जब तक रही मुस्कुराती रही चल पड़ी बे वफ़ाई की इक आँधी ओरप्यार के दीपकों को बुझाती रही नाली का कीड़ा नाली में ही बस जियामख़मली फ़र्श मौत उस पे लाती रही क्या उसे ज़ुल्म का अपने एहसास थाक्यूँ चराग़ों की लौ थरथराती रही किस लिए कोई मंज़िल ये पाती भलाज़िन्दगी ख़ाक थी ख़ाक उड़ाती रही देखो तो मेरे मौला की क़ुदरत ज़रातीरा बख़्ती मेरी…

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