कविता 

ग़ज़ल: वो हुस्न अपनी ग़ज़ल के रचाव में रखना

ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज,बाराबंकी,उत्तर प्रदेश लगाए दिल को किसी के लगाव में रखनाफ़क़त है ख़ुद को हमेशा तनाव में रखना बड़ा अजब है ज़माना है कहता इश्क़ इसेकिसी के दिल से दिल अपना मिलाव में रखना जो सब को खींच ले दीवाना कर के अपनी तरफ़वो हुस्न अपनी ग़ज़ल के रचाव में रखना है मेरा मश्विरा थोड़ी सी नर्मी ऐ हमदमतुम अपनी जिन्से-मोहब्बत के भाव में रखना पता है जिस में है अख़लाक़ क़ीमती है बहुतमगर ये पलड़ा हमेशा झुकाव में रखना न झूमर और न गुलदान की ज़रूरत हैमुझे तो…

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कविता जीवन चरित्र 

किताबे इश्क़ व वफा हैं खदिजतुल कुबरा

10 रमज़ानूल मुबारक यौमे विसाल उम्मुल मोमिनीन ज़ौजए रसूल हज़रत खदिजतुल कुबरा रदियल्लाहो तआ़ला अन्हा अशरफ रज़ा क़ादरीखतीबो इमाम मस्जिदें अमीने शरीअ़तबलौदाबाजार छत्तीसगढ़ किताबे इश्क़ व वफा हैं खदिजतुल कुबरानिसाबे सब्रो रज़ा हैं खदिजतुल कुबरा अमीना, पारसा, आला नसब, सलीक़ा शेआ़रखुदा ही जाने के क्या हैं खदिजतुल कुबरा हयाओ़ हिल्म की उनसे है रौशनी फैलीचराग़े हिल्मो हया हैं खदिजतुल कुबरा रसूले पाक की खिदमत में खुद को सौंप दियाखुदा के दीं पे फिदा हैं खदिजतुल कुबरा नबी का साथ निभाया है आखरी दम तकसरापा महरो वफा हैं खदिजतुल कुबरा नबी…

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नात: ढूंढते हैं लोग उन जैसा बशर बेकार है

ढूंढते हैं लोग उन जैसा बशर बेकार हैमुस्तफ़ा का मिस्ल कोई भी नहीं संसार में बे खुदी होती है कैसी हसरते दीदार मेंडस लिया एक मार ने, एक यार को, एक ग़ार में चौदहवीं के चांद में इतनी चमक है ही नहींनूर है जितना मेरे सरकार के रुखसार में दर बदर जन्नत की खातिर क्यों भटकते हैं भलाखुल्द तो है आपके आ़माल में, किरदार में अहले दानिश को पता देता है वह फ़िरदौस काजिसका दिल दीवाना होता है नबी के प्यार में दोनों बाज़ू काट कर बातिल यज़ीदी खुश ना…

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कविता 

लाज़िम है

✍🏻सिद्दीक़ी मुहममद ऊवैस जब बातिल का बोलबाला हो,ज़ालिम सब पर हावी हो,न्याय टकों पे बिकता हो,नफ़रत की राजनीति,जगह जगह पर चलती हो,सत्ता धारी अहंकार में डूबे हों,सरकारें झूठ पर चलती हों,हक़ को सिरे से दबाया जाता हो,सच्चाई से मुंह मोड़ा जाता हो?सवालों से कतराया जाता हो,जनता का विश्वास तोड़ा जाता हो,मासूमों को बेकसूरों को…रास्ते से हटाया जाता हो,लोकशाही को सरेआम कुचला जाता हो,तानाशाही का डंका बजाया जाता हो,ऐसे में हक़ की स्याही से..सच्चाई के शब्द लिखना,बेझिझक, बेबाक बोलना,हर शहरी का हर आन बोलना,न्याय की ख़ातिर लड़ना,आवाज़ बुलंद करना,लाज़िम है………….!!!!!!! हमारी…

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कविता 

नात: जहां भी हो वहीं से दो सदा सरकार सुनते हैं

जहां भी हो वहीं से दो सदा सरकार सुनते हैंसरे आइना सुनते हैं पसे दीवार सुनते हैं मेरी हर सांस उनकी आहटों के साथ चलती हैमेरे दिल की धड़कनों की भी वह रफ़्तार सुनते हैं गुनाहगारों दरूदे वालिहाना भेज कर देखोवह अपने उम्मती का नग़म-ए-किरदार सुनते हैं मैं सदक़े जाऊं उनकी रहमतल्लिला़लमीनी केपुकारो चाहे जितनी बार वह हर बार सुनते हैं मुज़फ्फर जब किसी महफ़िल में उनकी नात पढ़ता हैमेरा ईमान है वह भी मेरे अशआ़र सुनते हैं हमारी आवाज़humariaawazhindi.com

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कविता 

इश्क़ ए हक़ीक़ी

✍🏻सिद्दीक़ी मुहममद ऊवैस मैं एक रहस्य उलझा सा,जिसे हल किया है तूनेमैं एक संदेश अधूरा सा,जिसे पूरा किया है तूनेमैं एक साज़ टूटा सा,जिसे जोड़ा है तूनेमैं एक नाम छुपा सा,जिसे ज़ाहिर किया है तूनेमैं एक सवाल हूँ दुश्वार सा,जिसे जवाब दिया है तूनेमैं एक चिराग़ बुझा सा,जिसे रोशन किया है तूनेमैं एक जिस्म बेजान सा,जिसे जानदार किया है तूने….!!!!! हमारी आवाज़humariaawazhindi.com

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कविता 

ग़ज़ल: किस की पुर कैफ़ सी याद आती रही

ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज, बाराबंकी यारो क्यूँ बेख़ुदी मुझ पे छाती रहीकिस की पुर कैफ़ सी याद आती रही पास आई तो थी ज़िन्दगी सिर्फ़ अश्कदूर जब तक रही मुस्कुराती रही चल पड़ी बे वफ़ाई की इक आँधी ओरप्यार के दीपकों को बुझाती रही नाली का कीड़ा नाली में ही बस जियामख़मली फ़र्श मौत उस पे लाती रही क्या उसे ज़ुल्म का अपने एहसास थाक्यूँ चराग़ों की लौ थरथराती रही किस लिए कोई मंज़िल ये पाती भलाज़िन्दगी ख़ाक थी ख़ाक उड़ाती रही देखो तो मेरे मौला की क़ुदरत ज़रातीरा बख़्ती मेरी…

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कविता 

मनकबत: हमें तुमने अपना लिया आ़ला ह़ज़रत

है क़ल्बो जिगर की सदा आ़ला ह़ज़रतहो तुम आ़शि़के़ मुस्त़फा़ आ़ला ह़ज़रत यही है मेरी इल्तिजा आ़ला ह़ज़रतकरो जामे उल्फ़त आ़ता आ़ला ह़ज़रत बना कर यह दिल आईना आ़ला ह़ज़रतहमें तुम ने अपना लिया आ़ला ह़ज़रत मैं नजदी के झांसे में आऊं ना हर गिज़मुझे राहे ह़क़ पर चला आ़ला ह़ज़रत उसे खौ़फ़ कुछ भी नहीं नजदीयूं कारहेगा जो तुम पर फि़दा आ़ला ह़ज़रत ना छोड़ेगा वह दामन ए सुन्नीयत कोजो आ़शि़क़ तुम्हारा हुवा आ़ला ह़ज़रत ज़बां में हो नौशा़द की इतनी ता़क़तक़सीदा पढ़े आप का आ़ला ह़ज़रत हमारी आवाज़humariaawazhindi.com

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कविता लेख 

हिसाब

सिद्दीक़ी मुहममद ऊवैस सोचा आज..हिसाब कर दूँ…बीते वक़्त का हिसाब…पिछली यादों का…लम्हों का…बीती बातों का हिसाब…अब तक की…ज़िंदगी का हिसाब…बरसों पहले…साथ छोड़ने वाले…बचपन का हिसाब…फ़िर हर एक पल को…सिरे से याद किया हमने…अब तक क्या पाया…क्या खोया… क्या कमाया…कितना लूटाया…लेकिन मुश्किल था ये सब…बहुत ज़ोर दिया अक़्ल पर…दिमाग खपाया… बावजूद इसके….कुछ याद ना आया…बढ़ती उम्र… गुज़रते दिन..हवा सी तेज़ ज़िंदगी…बस इन्हें साथ पाया…!!!! हमारी आवाज़humariaawazhindi.com

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कविता 

नात: ऐ मेरे यार तू क्या मुस्तफ़ा शनास नहीं

ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज, बाराबंकी,उत्तर प्रदेशफ़ोन:7007368108 ये तेरे लहजे में क्यूँ उनसुरे-सिपास नहींऐ मेरे यार तू क्या मुस्तफ़ा शनास नहीं मदीने जाने के असबाब सिर्फ़ बन जाएंनहीं है ग़म कोई दौलत जो अपने पास नहीं मुझे दिलाएँ गे फ़िरदौसे-नाज़ आक़ा मेरेमेरा यक़ीन है ये दोस्तो क़ियास नहीं ब फ़ैज़े-आक़ा ऐ महशर मुझे तेरा हाँ तेराकोई भी ख़ौफ़ नहीं है कोई हिरास नहीं मेरे नबी की अता तुझ को कैसे मिल पाएतेरी तमन्ना में पहलू-ए-इल्तिमास नहीं दरूद पाक पढ़ो और मोजिज़ा देखोनबी का नाम जहाँ है वहाँ पे यास नहीं ज़रूर होगा…

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