धार्मिक सामाजिक 

बहुविवाह और भारतीय धर्म-संस्कृति

ग़ुलाम मुस्तफा नईमी, दिल्ली इसे प्रोपगंडे का प्रभाव कहें या अपनी ही धार्मिक शिक्षाओं को न जानने का नुकसान कि इस देश के अधिकांश लोग इस्लाम और मुसलमानों से उन चीजों की वजह से नफरत करने लगे हैं जो उनकी अपनी संस्कृति और सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों में बहुविवाह भी शामिल है। बहुविवाह का अर्थ है एक से अधिक विवाह, जिसे अंग्रेजी में polygamy कहा जाता है। कुछ शातिर लोगों ने मुसलमानों को बदनाम करने के लिए “हम दो हमारे पच्चीस” और “हम चार हमारे…

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गलत फहमियो का निवारण राजनीतिक सामाजिक 

आतँकवाद: हक़ीक़त और साज़ीश?

सवाल:- मुस्लिम जिहाद करने के लिए आतँकी संघटन क्यों बनाते हैं..? जवाब:- पहले तो इस सवाल करने वाले को अपनी बुध्दि का थोड़ा इस्तेमाल करना चाहिए और सोचना चाहिए कि विश्वश्व में 180 करोड़ (1.8 Billion) मुस्लिम हैं और अगर क़ुरआन पढ़ कर लोग आतंकवादी बन रहे होते या वो आतँकी संघटन बना रहे होते तो आज दुनिया की क्या हालत हुई होती ? अतः यह सवाल और सोच ही बिल्कुल निराधार है। दूसरी बात अगर आतँकी संघटन बनाना मुस्लिमो के धर्म ग्रन्थ में होता तो आज विश्व में सबसे…

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गलत फहमियो का निवारण धार्मिक 

“मैं जीव हूँ मांस नहीं” के पोस्टर मुस्लिमो के खिलाफ नफ़रत और ज़हर फैलाने का एजेंडा

सवाल:- ईद उल अज़हा के मौके पर कई जगह पोस्टर लगाए जाते हैं और खबरें चलाई जाती हैं जिनमे जानवरो की तस्वीर होती है और लिखा होता है “में जीव हूँ मांस नहीं” या दूसरे प्रकार से ईद के बारे में आपत्ति ली जाती है इस बारे में जवाब दें? जवाब:-  मैं भी जीव हूँ, माँस नही। इस तरह के पोस्टर सिर्फ़ ईद-उल-अज़हा के मौके पर ही क्यों लगाए जाते हैं? या इस तरह की बातें ईद के बारे में ही क्यों चलाई जाती हैं ? भारत की कुल 71% जनता…

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गलत फहमियो का निवारण धार्मिक 

क्या इस्लाम में मांसाहारी होना ज़रूरी है

सवाल: क्या इस्लाम में मांसाहारी होना ज़रूरी है? माँसाहार के लिए जीव हत्या क्यों कि जाती है? जवाब:- माँसाहार इस्लाम में अनिवार्य (फ़र्ज़ नहीं है) एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक अच्छा मुसलमान हो सकता है। मांसाहारी होना एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं है। यह भी एक भ्रांति है कि सिर्फ मुस्लिम ही मांसाहार करते हैं ।जबकि तथ्य यह है कि विश्व की लगभग 90 % जनता और खुद हमारे भारत देश की 70% जनता मांसाहारी है। विश्व के किसी भी प्रमुख धर्म में माँसाहार को वर्जित…

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धार्मिक 

ईद-उल-अज़हा पर हेल्प लाइन नंबर जारी, पूछें दीनी सवाल

गोरखपुर। मुसलमानों की सहूलियत के लिए उलेमा-ए-अहले सुन्नत की ओर से हेल्प लाइन नंबर जारी किया गया है। हेल्प लाइन नंबर पर क़ुर्बानी से संबंधित दीनी मसलों के बारे में पूछा जा सकता है। बस एक कॉल पर घर बैठे शरई मसले का हल उलेमा के जरिए आसानी से मिल सकेगा। उलेमा-ए-अहले सुन्नत ने अपील किया है कि क़ुर्बानी पर साफ-सफाई का पाबंदी के साथ ख्याल रखा जाये। क़ुर्बानी के जानवर व क़ुर्बानी की फोटो-वीडियो न बनाई जाये। गरीबों व जरूरतमंदों की मदद की जाए। ईद-उल-अज़हा हेल्प लाइन नंबर :…

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धार्मिक 

ईद-उल-अज़हा का त्योहार 21 जुलाई को मनाया जायेगा

गोरखपुर। रविवार को इस्लामी माह ज़िलहिज्जा का चांद प्रदेश के कई जिलों में देखा गया। लिहाजा उलेमा-ए-अहले सुन्नत ने ऐलान किया कि ईद-उल-अज़हा (बक़रीद) का त्योहार 21 जुलाई बुधवार को अकीदत के साथ मनाया जायेगा। वहीं 21, 22 व 23 जुलाई तक लगातार तीन दिन क़ुर्बानी की जायेगी। “क़ुरआन में है क़ुर्बानी करने का हुक्म – मुफ़्ती अख्तर मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ़्ती अख्तर हुसैन मन्नानी (मुफ़्ती-ए-शहर) ने बताया कि दीन-ए-इस्लाम में क़ुर्बानियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अजमत-ए-इस्लाम व मुस्लिम सिर्फ क़ुर्बानी में है। उसी में से…

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मस्अला: मुर्दा का अकीका करना कैसा है

जिसका इंतिका़ल हो जाए उसका अ़की़का़ करना कैसा है? ह़सन रजा़, मोरबी, गुजरात।98242 92275 अल-जवाब जिसका इंतिका़ल हो जाए उसकी तरफ से अकी़का़ नहीं किया जा सकता है, अलबत्ता ईसाले सवाब के लिये कु़र्बानी कर सकते हैं। सरकारे आला हज़रत अजी़मुल बरकत इमाम अह़मद रजा़ खा़न फा़ज़िले बरैलवी अलैहिर्रहमा फरमाते हैं कि “मुर्दे का अ़की़का़ नहीं, कि वोह शुक्रे विलादत है। बख़िलाफ कु़र्बानी के इसालै सवाब है।”[फतावा रज़विया, जिल्द 28, सफा़ 593]वल्लाहु अअ़्लम।▪️ ✍️ ज़फ़र नूरी अज़हरी[मुफ़्तिए ग्वालियर चम्बल सम्भाग]5, जुलाई 202198276-88786 हमारी आवाज़humariaawazhindi.com

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मस्अला: हज़रत अबु बकर की खिलाफत

ह़ज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु पहले ख़लीफा हैं? क्या आप की ख़िलाफत कु़रआनो हदीस से साबित है। दलीलों की रोशनी में जवाब इनायत फरमाऐं। अमन ख़ानअलापुर, ज़िला मुरैना, (म.प्र.)97138 55804 अल-जवाब अंबिया ए किराम व रसूलाने इज़ाम (अ़लैहिमुस्सलाम) के बाद सब से अफज़ल ह़ज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु हैं।[फतावा रज़विया, जिल्द 28 सफा़ 478] ह़ज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु पहले ख़लीफा़ हैं, इस बात पर तमाम सहाबा ए किराम रिज़वनुल्लाहि अलैहिम अजमईन का इत्तेफाक़ है। और आप रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफत कु़रआन शरीफ की कई आयतों…

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क़सीद ए ग़ौसीया और हज़रते रिफाई

क़सीद ए ग़ौसीया को ग़ौसे आज़म رضی اللہ تعالی عنہ ने अपनी हयाते ज़ींदगी में मजलीसे वाअज़ में मीम्बर पर वज्दानी केफियतमें ब हुकमे खुदावंदी तमाम अशआर ईरशाद फरमाए, क़सीद ए ग़ौसीयामें तक़रीबन 35 अशआर है और उसी में 33 वां शेअर हज़रत शैख़ सय्यद अहमद कबीर रिफाई رضی اللہ تعالی عنہ कि शान में आपके नामे अक़दस के साथ ईरशाद फरमाया, और वोह शेअर ये हे, کَذَا اِبنُ الرِّفَاعِی کَانَ مِنیِفَیَسلُكُ فِی طَرِیقیِ وَ اشتِغَالِی (तरजुमा :- ईसी तरह ईब्ने रिफाई भी मुज़से हे के मेरे हि शुग़ल और…

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धार्मिक 

जेल भरो आंदोलन ही ज़रूरी क्यूं……?

5 सालों से हम कम्प्लेंट​, एफ़​. आई. आर​. और मेमोरंडम (ज्ञापन​) बार बार दे रहे हैं, विरोध प्रदर्शन और रैलियां भी हो रही हैं, मगर उनका कोई ख़ास असर नही नज़र आता, जबकि इन 5 सालों में इस्लाम के पैग़म्बर और इस्लाम के ख़िलाफ़ नफ़रत और भ्रम फैलाने वाली अशिष्ट और अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ सी आई है, कार्यवाही ना होने की असल वजह सरकार से मिलने वाला समर्थन और सुरक्षा बल्कि सरकार की शह और सहयोग है, सरकार इन अपराधियों को सुरक्षा और सहयोग देती है, जबकि मुसलमानों को…

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