राजनीतिक 

सुप्रीमकोर्ट: बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का

लेखक: डाक्टर सलीम खान

दिल्ली की सरहद पर किसानों की तहरीक जल्द ही दो माह पुरानी हो जाएगी। इस को सारे देश के लोग टेलीविजन चैनल्स पर देख रहे हैं लेकिन किसी शहर ने इस की हिमायत में पेशकदमी नहीं की बल्कि ये शर्फ मुंबई को हासिल हुआ कि वहां के लोग किसानों की हिमायत में बड़े पैमाने पर मैदान में उतरे और एक कामयाब जलूस का एहतिमाम किया। मुंबई देश की मआशी राजधानी है। ये एक तिजारती शहर है जहां पैसा बोलता है। इसलिए लोगों को ताज्जुब हुआ कि आख़िर सियासी राजधानी से ये आग मआशी राजधानी तक कैसे पहुंच गई ? दरअसल बात ये है कि मोदी और अमित शाह के लँगोटिया यार अंबानी और अडानी इसी शहर में रहते हैं । यहां के लोग सरमायादारों के हथकंडों से अच्छी तरह वाकिफ हैं इसलिए उनका इस साजिश की तह में पहुंच कर एहतिजाज के लिए उठ खड़ा होना कोई हैरत की बात नहीं है। किसान और सरकार का खते मुसतकीम जब सरमायादारों के दाख़िले से मुसल्लस बना तो अवाम भी काश्तकारों के शाना बशाना खड़े हो गए और अब ये मुसल्लस फैल कर मुरब्बा बन गया। मुंबई से उठने वाले एहतिजाज के ये शोले आगे चल कर पूरे मुल्क में फैल जाऐंगे।
मुंबई का ये मुजाहरा सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले के बाद हुआ जिसके जरिये किसानों को रेशम की डोरी से फांसी देने की कोशिश की गई लेकिन किसानों की तरह मुंबई के अवाम भी फरेब में नहीं आए। महाराष्ट्र की तहजीब में तमाशा को वही एहमीयत हासिल है जो शुमाल में नौटंकी की है। मौसीकी से पुर इस नाटक की जड़ें यहां की सकाफत में गहराई तक पैवस्त हैं। किसानों के मुआमले में सुप्रीमकोर्ट के अंदर जो ड्रामा खेला गया उस को देखकर बेसाखता कालू बालू का तमाशा याद आ गया और साथ ही मराठी काया मुहावरा भी मैं रोने जैसा करता हूँ तू मारने जैसा कर। इस मुआमले में अदालत कालू की तरह मारने का ढोंग कर रही थी और सरकार मगरमच्छ के आँसू बहाने की अदाकारी करती दिखाई दे रही थी । वैसे ये भरम भी ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सका और गुबारा बहुत जल्द फट गया। किसान तहरीक के 21 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट नींद से बेदार हुई और समाअत का आगाज हुआ । उस वक्त अदालत ने मामूली सी सख््ती दिखाई । सरकार और किसानों के दरमयान होने वाली गुफ्त व शनीद से अदम इत्मीनान का इजहार किया और किसानों के तईं हमदर्दी जताई। ये सब करने के बाद अदालत ने हुकूमत से पूछा कि क्या वो इस कानून की आरिजी मुअत्तली पर गौर कर सकती है ताकि बातचीत के लिए माहौल साजगार हो सके।
सुप्रीम कोर्ट का काम इस तरह हाथ जोड़ कर सरकार दरबार से गुजारिश करना नहीं है। इस से सुप्रीमकोर्ट का वकार मजरूह हुआ मगर इस दौर में एक फर्दे वाहिद के अलावा किसी और की इज्जत व वकार से लोग बेन्याज हो चुके हैं और वह किसानों की तहरीक से आँखें मूंद कर मोनी बाबा बना हुआ है। अदालत और सरकार को ये गलतफहमी थी इस झांसे में आकर किसान सुप्रीमकोर्ट की जानिब दौड़ पड़ेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अर्नब गोस्वामी के लिए छुट्टी के दिन रात 8 बजे फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट फिर एक-बार चादर तान कर सो गई । किसान अपनी तहरीक चलाते रहे गुफ्तगु के दौर नाकाम होते रहे । आठवें दौर के इखतिताम पर वजीरे जराअत नरेंद्र तोमर ने कहा ताली एक हाथ से नहीं बजती । उनके हमनाम वजीरे आजम ने भी को रोना की वबा को भगाने लिए 21 दिन की मोहलत मांग कर ताली बजाने का आदेश दिया था लोगों ने जोश में आकर ताली के साथ थाली और घंटी भी बजाई लेकिन कोरोना पर इस का कोई असर नहीं हुआ। अब वजीरे जराअत किसानों का मसला भी ताली बजाकर हल करना चाहते हैं लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि ये किसान सरकार की बैंड बजाने के इरादे से आये हैं।
सरकार और किसानों के दरमयान होने वाली गुफ्तगु के माहौल का अंदाजा चंद वाकियात की मदद से किया जा सकता है। पहली बार जब किसान रहनुमा बातचीत के लिए आए तो हुकूमत ने अंडर सैक्रेटरी की सतह के अफसरान को भेज दिया । किसान रहनुमाओं ने गुफ्तगु से इनकार कर दिया और लौट गए इस तरह गोया मुहूर्त ही गलत निकला। किसी एक फरीक की नीयत में खोट हो तो यही होता है। इस के बाद जब किसान रहनुमा आए तो उन्होंने सरकारी पकवान खाने से इनकार कर दिया और जो कुछ अपने साथ लाए थे उसे जमीन पर बैठ कर खाया । इस तरह एक तरफ सरकार दरबार के लोग ऊंची कुर्सीयों पर बैठ कर पाँच सितारा खाना खा रहे थे और दूसरी जानिब किसान रहनुमा जमीन पर बैठ कर अपनी रूखी सूखी से पीट भर रहे थे । ये एक अलामती एहतिजाज था जो मीडिया में बहस का मौजू बन गया। अगली मुलाकात में हुकूमत की अक्ल ठिकाने आई तो वजीर भी किसानों के साथ जमीन पर बैठ गए और लचक का मुजाहरा किया लेकिन ये मीडिया को दिखाने के लिए की जाने वाली मुनाफकत थी इसलिए कि सरकारी मौकिफ में जर्रा बराबर फर्क नहीं आया था।
नौवीं मुलाकात में सरकारी टाल मटोल को देखकर किसान रहनुमा बलवंत सिंह ने मीटिंग के दौरान एक पोस्टर हाथों में उठा लिया जिस पर लिखा था जीतेंगे या मरेंगे। ये पोस्टर दरअसल किसानों की बेजारी का ऐलान था लेकिन इस में अज्म भी पोशीदा था कि वो अपनी तहरीक को कामयाब करने के लिए जान की बाजी लगा देंगे। इस मुलाकात के दौरान कुछ किसान रहनुमाओं ने सरकार से कह दिया कि अगर वो संजीदा नहीं है तो बिलावजह वक्त जाए करने से क्या हासिल ? उन्हें लिख कर दे दिया जाये कि कोई तब्दीली नहीं होगी । नशिस्त के बाद जब भारतीय किसान यूनीयन के रहनुमा राकेश टिकैत से पूछा गया कि क्या हुआ ? तो वो बोले तारीख पर तारीख पड़ रही है। सरकार ने कहा कि बिल वापिस लेने के अलावा कोई मुतबादिल बताओ हम मान लेंगे । हमने कहा बिल वापिस लेकर जो चाहो कहो हम मान लेंगे । इस तरह उन्होंने हमारी नहीं मानी और हमने उनकी नहीं मानी । इस मीटिंग के बाद किसानों के एक रहनुमा हन्नान मुल्ला ने कहा कि सरकार चाहती है दोनों फरीक सुप्रीमकोर्ट में जाएं लेकिन उन लोगों ने इनकार कर दिया । इस दूर अंदेशी की उम्मीद हुकूमत और अदालत को नहीं रही होगी।
किसानों ने जब 26जनवरी को सरकार से यौम जम्हूरिया की परेड करने का ऐलान किया और इसकी एक कामयाब रीहरसल भी कर दी तो हुकूमत पर दबाव बढ़ा इस लिए कि अगर किसानों के ट्रैक्टर दिल्ली की सड़कों पर निकले तो प्रधान जी की तकरीब फीकी पड़ जाएगी और उसे कोई नहीं देखेगा ? वैसे भी बर्तानवी वजीरे आजम बोरिस जॉनसन कोरोना का बहाना बनाकर एक तरफ हो गए हैं वर्ना कुछ लोग उन्हें को देखने के लिए गोदी मीडीया के चैनल्स पर आते। खैर इस अलार्म ने सुप्रीम कोर्ट को फिर से जगाया और दूसरी मर्तबा 11 जनवरी को यानी किसान तहरीक के 47 वें दिन समाअत शुरू हुई। इस वक्त तक 50 से ज्यादा लोग मैदान एहतिजाज पर हलाक हो चुके थे और उनमें से चार ने अहितजाजन खुदकुशी कर ली थी। अदालत ने पहले दिन सरकार को खूब फटकार लगाई और यहां तक कह दिया कि वो मजीद सब्र की तलकीन न करे । हुकूमत कानून मुअत्तल करे वर्ना वो खुद ये कर देगी । अदालत को ये उम्मीद थी इस तब्सिरे को सुनकर किसान भांगड़ा शुरू कर देंगे लेकिन उन्होंने कहा कि अव्वल तो वो सुप्रीमकोर्ट में गए नहीं दूसरे उनका मुतालबा इस कानून की आरिजी मुअत्तली का नहीं है बल्कि वो तो चाहते हैं कि सरकार इसको वापिस ले, इस तरह ये तीर भी निशाना चूक गया। दूसरे दिन अदालत ने मरता क्या न करता की मिस्दाक कानून की अमल आवरी पर तो रोक लगा दी साथ एक कमेटी भी तशकील कर दी जिससे बिल्ली थैले से उछल कर बाहर आ गई और ये शेअर याद आ गया
बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक कतरा-ए खूं न निकला

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